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उत्तराखण्ड

कल्टीवेटिंग माइंडफूलनेस: ए जर्नी टुवर्ड्स साइकोलॉजिकल वेल- बीइंग विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन

हल्द्वानी। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के द्वारा आई. सी. एस. एस. आर के माध्यम से नर्चरिंग हैप्पीनेस, इनहैंसिंग वैलनेस एंड कल्टीवेटिंग माइंडफूलनेस: ए जर्नी टुवर्ड्स साइकोलॉजिकल वेल- बीइंग विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। जिसमें विभिन्न मनोवैज्ञानिकों और शोधार्थियों ने अपने -अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए और समाज में खुशियां कैसे लाई जा सकती है वर्तमान दौर में यह क्यों आवश्यक हो गया है इस विषय पर चर्चा की गई। सभी विद्वानों ने अपनी बातें इस प्रकार कही
भारतीय संस्कृति ने हमेशा लोक कल्याण की बात की- प्रो. सौन
भारतीय संस्कृति का स्वरूप हमेशा से ही सामूहिक रहा है समूह में व्यक्ति एक दूसरे की मदद करता है, अपने दुख-सुख व विचार साझा करता रहा है जिससे वह कभी अकेलेपन व ड्रिपेशन का शिकार नहीं हुआ। वैलनेस व हैप्पीनैस हमेशा से ही हमारी संस्कृति में रची बसी रही है ये कहना है भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसांधान परिषद (आईसीएसएसआर) के नार्थ रीजन के डायरेक्टर प्रो. प्रो.जी.एस. सौन का. मौका था उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के समाज विज्ञान विद्याशाखा के द्वारा आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का।
शुक्रवार को आयोजित इस एक दिवसीय सेमिनार में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए प्रो. सौन ने कहा कि हमें हर हाल में कैसी भी परिस्तिथियां हों उनका सामना करना आना चाहिए. भावनात्मक प्रसन्नता को उन्होंने सभी अच्छाइयों का आधारभूत तत्व बताया। भारतीय व पश्चिमी परिप्रेक्ष्य में उन्होंने हैप्पीनेस व लोक कल्याण पर बात रखी। सेमिनार के मुख्य वक्ता सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के सेवानिवृत प्रो. मोहम्मद गुफरान ने कहा कि हैप्पीनैस के मानकों में फिनलैंड पहले पायदान पर है और भारत 126 वें। हमें पुनर्अवलोकन करने की जरूरत है कि हम अपने नागरिकों को प्रसन्न रखने में कहां पिछड़ रहे हैं, किन किन मानकों पर हमें काम करना है। उन्होंने विस्तार से बताया कि हमारा भीतर के नकारात्मक विचार ही हमें बीमारी की तरफ ले जाते हैं लिहाजा हमें बहुत सकारात्मक व उदार होना चाहिए। सेमिनार के पहले सत्र की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ओ.पी.एस. नेगी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा अच्छाईयों पर परोपकार से भरी हुई है आज हमें उसी जीवन शैली की तरफ जाने की जरूरत है। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य पर विवि द्वारा सर्टिफिकेट कोर्स शुरु किये जाने की जरूरत बताई और कहा कि ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए समाज विज्ञान विद्यापीठ के द्वारा इस तरह के सेमिनार लगातार कराए जाने चाहिए। इस सत्र का उद्घाटन भाषण देते हुए समाज विज्ञान विद्याशाखा के निदेशक प्रो. गिरिजा प्रसाद पांडे ने कहा कि 5 वीं शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर आज तक सभ्यताओं का जो भी विकास हुआ है उसके मूल में समग्र समाज को विचारशील बनाना व प्रसन्न रखना ही रहा है। उन्होंने कहा कि हर देश की गर्वनेंस की ये जिम्मेदारी है कि वह आम नागरिक के चिंतन से नकारात्मक वृतियों को दूर करे। सेमिनार की संयोजक और मनोविज्ञान में असिसटेंट प्रोफेसर डा. भाग्यश्री ने कहा कि आज हैप्पीनैस व कल्याण की बात होना बेहद जरूरी है। जब हम स्वयं ख़ुश रहेंगे तो हमारे साथ जुड़े हुए लोगों को ख़ुश रख पाएंगे। कार्यक्रम का संचालन करते हुए कार्यक्रम की सचिव डॉ विनीता पंत ने कहा वर्तमान समय में प्रत्येक मानव में सकारात्मकता का विकास होना बहुत आवश्यक
सेमिनार के दूसरा सत्र तकनीकि था जो कि समानांतर चला। दोनों स्थानों पर देश भर से आए प्रतिभागियों ने अपने विषय संबंधी रिसर्च पेपर प्रस्तुत किये। देश भर की संस्थाओं, महाविद्यालयों से लगभग 56 प्रतिभागियों ने प्रस्तुत किये रिसर्च पेपर प्रतिभागियों ने ऑनलाइन व ऑफलाइन अपने रिसर्च पेपर प्रस्तुत किये जिसमें, चेन्नई, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र , झारखंड, राजस्थान, उत्तरप्रदेश व उत्तराखंड के रिसर्च स्कॉलर व असिसटेंट प्रोफेसर ने भागीदारी की। सेमिनार के समापन सत्र में उच्च शिक्षा निदेशक प्रो. चन्द्र दत्त सूंठा ने नोबा हरारी की किताबों का जिक्र करते हुए कहा कि आज हैप्पीनैस व कल्याणकारी योजनाओं की बहुत जरूरत है। मुख्य वक्ता प्रो. प्रवीण कुमार बिष्ट ने भी भारतीय परंपराओं में लोक कल्याण के भाव को निहित बताया। सेमिनार में देहरादून के डोईवाला महाविद्यालय में मनोविज्ञान में प्रोफेसर वल्लरी कुकरेती ने प्रतिभागियों से विस्तार में बहुत सी बातें साझा की। एमबीपीजी कालेज में मनोविज्ञान की प्रोफेसर रेखा जोशी ने भी बता रखी। इसके अलावा सेमिनार में एसएसजे अल्मोड़ा विवि के मनोविज्ञान विभाग में प्रो. मधुलता नयाल समेत उत्तराखंड मुक्त विवि के सभी विद्याशाखाओं के निदेशक व सहायक प्राध्यापक मौजूद रहे। सेमिनार के समापन सत्र का संचालन आरुषि ध्यानी ने किया।

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