देवीधुरा का विश्व प्रसिद्ध बगवाल मेला : सक्षिप्त परिचय

ख़बर शेयर करें

प्राचीन समय में वाराही मन्दिर में नरबलि प्रथा प्रचलन में थी, जिसमें चारों खामों के लोग बारी-बारी से इस प्रथा का निर्वहन करते आ रहे थे। कहा जाता है कि चम्याल खाम का कोई परिवार इस नरबलि के क्रम में अपने एकमात्र पुत्र की बलि हो चुकने के बाद “बुढिया मतारी” का संसार अब ‘नाती'(पौत्र) पर आधारित था कि नरबलि के लिए उसकी बारी आ गई। तो उस बुढिया मतारी ने मां वाराही और चारों खामों के प्रधानों से अपने पौत्र को अभयदान दिलाने के लिए प्रार्थना की। कहते हैं कि माता वाराही के हुक्म के अनुसार चारों खामों के प्रधानों में सहमति बनी कि नरबलि के स्थान पर चारों खामों के रणबांकुरों द्वारा “बगवाल” खेली जायेगी जिसमें लगभग एक व्यक्ति के रक्त के बराबर रक्तपात वाराही मंदिर के आँगन “खोलीखाँड़ दुबाचौड़” में होगा।

जब देवी स्वयं अपने डांगर(पुजारी) पर अवतरित होकर बीचोंबीच बगवाल के मैंदान में परिक्रमा कर चंवर झुलाती, नाचती दर्शन देगी तभी शंखध्वनि पूर्वक ‘बगवाल’ पूर्ण मानी जायेगी। उसके बाद सभी खाम आपस में गले मिल जायेंगे। इस प्रकार अभी तक युद्ध की युद्धजन्य कटुता अब कौतिक के रूप में परिणित हो जाती है। जो कि देवीधुरा के खोलीखाँड़ दुबाचौड़ मैंदान के अलावा विश्व में कहीं भी देखने को नहीं मिलता। चूंकि युद्ध के उपरांत कटुता एवं वैमनस्यता का ही जन्म होता है लेकिन खोलीखाँड़ में ऐसा नहीं, यहाँ युद्ध के उपरान्त खामों के लोगों द्वारा एक दूसरे से गले मिलकर कुशलक्षेम पूछी जाती है और वर्षभर खुशी, सुख शान्ति की शुभकामना के साथ अगले वर्ष फिर से मिलने का वादा किया जाता है। (सांच होले खोलिखाँड़ देखी लें) अर्थात् देवी का सच्चा गण या सेवक होगा तो खोलीखाँड़ दुबाचौड़ में बगवाल में उतरेगा।

👉 ० व्रत पूजा-पाठ हेतु जो चारित्रिक और शारिरिक शुद्धि अपेक्षित होती है वैसी ही शुद्धि बगवाल खेलने के लिए भी आवश्यक होती है।
० कहते हैं कि एकबार कुमाऊं कमिश्नर ट्रेल ने बगवाल (पत्थर युद्ध) को हिंसक वारदात मानकर रोकने का प्रयास किया, तो ट्रेल की नेत्र ज्योति चली गई। मजबूरन ट्रेल को बगवाल से प्रतिबंध हटाना पड़ा और नेत्र ज्योति लौट आई। फिर बगवाल निरन्तर पत्थर से होने लगी।
०दैवीय शेर- जिम कार्बेट द्वारा देवीधुरा प्रवास के दौरान 5 दिनों में 8 बार इस शेर को देखा और चार बार उस पर गोली दागी लेकिन शेर को खरोंच तक नहीं लगी या तो गोली गायब हो गई या इधर उधर लगी। कार्बेट जैसे शिकारी के जीवन की यह आश्चर्यजनक घटना थी क्योंकि उस जैसे शिकारी का एक भी निशाना कभी चूकता नहीं था, कार्बेट ने सोचा शायद उनके देवीधुरा में आने पर मंदिर का शेर रुष्ट हो गया है उन्होंने देवीधुरा छोड़ने का निर्णय किया। 1926 में कार्बेट चांदी का छत्र मंदिर में चढ़ा गये। ( द टेम्पल टाईगर- जिम कार्बेट)
० अष्टबलि (अठवार) – 6 बकरे, 1 नारियल, 1 भैंसा।
० चार खाम सात थोक- चम्याल खाम, वालिक, लमगड़िया, गहड़वाल + 3अन्य थोक-गुरना, टकना, फुलाराकोट
० पड़तीदार – बनौली, कटयोली, पटनगांव, मूलाकोट, कानीकोट, दाड़मी आदि।
० पुजारी – गुरना व टकना के पुजारी
० वैदिक पूजा- मनटाण्डे, किमाड़, ढोलीगांव के सिमल्टिया।
० हवन हेतु तिल – रिखोली फल्याँट गांव के सिंग्वाल।
०फूलों की व्यवस्था- फुलाराकोट गाँव वालों की।
० फर्रो की व्यवस्था- सूनी गांव
० मन्दिर में नित्य पूजा का क्रम- गणेश पूजा,गुह्येश्वरी(गवौरी), द्वारपाल, भैरवथान, कालिका, मचवाल शिवपूजा और अंत में गुप्तेश्वरी (सिंहासन डोला के अन्दर सदैव गुप्त रहने वाली) को भोग लगता है।
मुख्य पूजनीय/दर्शनीय स्थल –
० गणेश मंदिर
० डोलाघर में विराजमान माँ अष्ट भुजा सिंहवाहिनी दुर्गा।
० सिंहासन डोला ( ताम्र पीठिका) जिसमें महामाया दिगम्बरा रुपी तेजोमय शक्ति वज्र वाराही विराजमान है (जिस पेटी को खोलते समय पुजारी आंखों में काली पट्टी बांधते हैं)
० सच्ची गवौरी
० कालिका मैया
० कलुवा वेताल
० भैरवथान
० द्वारपाल
० भीम शिला या रणशिला
० यज्ञ शाला
० मचवाल धुरी ऐड़ी राजा
० सकल सैम दुदाधारी
० मसानढुंगा
० हनुमान मन्दिर
० क्षीरगंगा
० केदारथान
० खुशीराम पण्डाल- कुमाऊंनी संस्कृति का मंच
० खोलीखाँड़ दुबाचौड़ मैदान- (माँ वाराही देवी का आंगन जिसमें बगवाल खेली जाती है)- विश्व में कहीं भी किसी फील्ड, खेल मैंदानों, स्टेडियम की जय जयकार नहीं होती लेकिन बगवाल में बगवाली वीर इस ” बगवाल क्रीड़ा स्थली” की जय जयकार करते हैं(खोलीखाँड़ दुबाचौड़ की जै)
चौसठि योगनि बावन वीरों की जै
० शिलिंग चौभाड़ी (चबूतरा)- पं. नारायण दत्त तिवारी, पं. हरगोबिंद पंत, बद्रीदत्त पाण्डेय, खुशीराम आर्य, गोवर्धन तिवारी, डुंगर सिंह बिष्ट, पं. प्रेमबल्लब पचौली, पं. घनश्याम शास्त्री, पूर्णानन्द उपाध्याय, दुर्गादत्त ओली, प्रताप भय्या, कल्याण सिंह अधिकारी, प्रताप सिंह बोरा आदि के द्वारा यहां पर इंकलाबी नारे तथा जनसम्बोधन होता था।
० प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर ऐतिहासिक डाक बंगला – जहाँ पर 64 आदमखोर बाघ मारने वाले शिकारी ” जिम कार्बेट” ठहरते थे। अपनी पुस्तक ” द टेम्पल टाईगर” में भी उन्होंने लिखा है- “किसी प्रकृति प्रेमी ने यदि देवीधुरा का भ्रमण किया है तो वह पर्वत की चोटी के पास स्थित डाक बंगले से दिखने वाले विहंगम दृश्य को कभी भुला नहीं पाएगा।” साथ ही जहाँ पर स्व. प्रेमबल्लब पचौली (कांडे) ने आजादी के गीत गाये। ढरौंज के महावीर महासिंह “बूबू” ने अंग्रेजों की बगवाल बंद करने की साजिश नाकाम की। ढोलीगांव के पं. केशवदत्त पाण्डेय ने अंग्रेज बहादुर को पुनः बगवाल कराने के लिए सर्वथा के लिए मार्ग प्रशस्त किया। जहां पर पं. नारायण दत्त तिवारी, पं. हरगोबिंद पंत, बद्रीदत्त पाण्डेय, खुशीराम आर्य, गोवर्धन तिवारी, डुंगर सिंह बिष्ट, पं. प्रेमबल्लब पचौली, पं. घनश्याम शास्त्री, पूर्णानन्द उपाध्याय, दुर्गादत्त ओली, प्रताप भय्या, कल्याण सिंह अधिकारी, महा सिंह अधिकारी, मोतीराम भट्ट, प्रताप सिंह बोरा, लीलाधर जोशी, गणेश सिंह पडियार, बैरम सिंह मेहता, पूर्णानन्द जोशी, अम्बादत्त पाण्डेय, भूपाल सिंह खाती, जयन्त शाह, प्यारेलाल गुप्ता आदि स्वातंत्र्य वीरों ने अपनी-अपनी विचारोत्तेजक वार्ताएं सम्पन्न कीं।
० सन् 1916 तक सैनिक भर्ती भी देवीधुरा में होती थी।
👉 देवीधुरा के चारों ओर अनेक कोट जैसे- डुंगराकोट, मूलाकोट, कानीकोट, फुलाराकोट, कजलाकोट, सुनकोट, रौतलाकोट आदि का होना यह इंगित करता है कि 10वीं शदी के आसपास देवीधुरा कुमूँ राज्य का केन्द्र था जिसका प्रभाव 1400 ई. तक रहा।
👉 ० सांस्कृतिक एवं अन्य गतिविधियां- पूर्व में बगवाल सम्पन्न होने के उपरांत खोलीखाँड़ दुबाचौड़ की रणभूमि कौतुहल जन्य वातावरण में सराबोर हो जाती थी। कहीं झोड़ा, कहीं चांचरी, कहीं छपेली, बैर, भग्नौल, न्यौली आदि तो कहीं पर आधुनिक भारत के कर्णधारों की आवाजाही, जन सम्बोधन होता था। कहीं पर ताराराम एंड पार्टी का सुरीला स्वर संगम वातावरण, कहीं पर खादी प्रचार में तल्लीन श्री केदार सिंह कुंजवाल जी का खादी ग्राम स्वरोजगार प्रचार, कहीं पर हुड़के की थाप पर प्रताप सिंह खाँकरी नजर आते थे तो कहीं मचवाल शिखर में 24 घंटे प्रश्नोत्तर की झड़ी लगाते कानों में अंगुली दाब कर हाथ में घिंघारु का लट्ठा टेककर दलबल के साथ बैर गाते त्योंनरा के ‘लछिबू’, आगर के उमेद सिंह तथा कनवाड़ के लोकमणि पुजारी जी थकते नहीं थे। और खुशीराम पण्डाल से दिन-रात कुंमाऊंनी गीतों के स्वर कानों में गूंजते। कहीं पर चरखा है तो कहीं पर प्लास्टिक के डिब्बों की रेल दौड़ रही है। कहीं पर जलेबी गरम, गुटके गरम, चाय गरम की आवाजें कानों में पड़ती हैं तो कहीं पर डबल के सोलह डबल के सोलह चिल्लाते गूमगरसाड़ी के नाशपाती बेचने वालों का तांता, कहीं पर राधेश्याम पटवा की एकमात्र दुकान-फुन्दा, धमेला, लीखे व जुंये मारने वाली कंघी, ऐना, काजल, नंगपालिस, कहीं पर रेडीमेट कपड़ों के दुकानदार तो कहीं पर खन्स्यूँ पतलोट के ठेकी, डौकल, डोरि, हड़पिया व पथरी की दुकानें होती थीं। कहीं पर कफल्टी के संगीत प्रेमी चौभैय्यों की ‘परानी की जड़’ वाली सर्कस होती थी(जिसमें मडुवे की रोटी दिखाते थे)। कहीं पर फिटकरी, सुहागा, जम्बू गदरान, सालम पंजी, हींग की दुकान तो कहीं घोड़े-खच्चरों का व्यापार, कहीं पंखी, दन, कालीन थुलमे, कम्बलों की दुकानें तो कहीं कमलेख एवं मंगललेख की लौह दस्तकारी से परिपूर्ण हंँसिया दराती, जाम, पराद, भज्याली, चासनी, कढाई की दुकानें होती थी।
-(पं. नन्दाबल्लभ शास्त्री)
लेकिन आज काफी कुछ बदल गया है अब सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर रात्रि में सास्कृतिक दलों द्वारा ही कार्यक्रम किये जाते हैं