हांस्य व्यंग-मास्टर साहब

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किसी पे काम नही है तो कोई काम के बोझ तले दबा हैं। कोई खाने के लिए भूख का इंतज़ार करता हैं तो कोई भूख खत्म करने के लिए खाता हैं। कोई दौड़कर भी मंज़िल तक नही पहुचता है तो किसी को सीढ़ी चढ़ाकर मंज़िल तक पहुँचाया जाता हैं। कोई रात -दिन एककर मेहनत ही करता रह जाता तो कोई आगे बढ़ने से रुकने का नाम ही नही लेता हैं। बड़ी उलझन हैं। माया निर्मोही है । मायावीरकुछ नही कह सकते। धर्म ग्रंथों की बात सुने तो वो कहते है कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। लेकिन यहाँ तो बहुत कुछ करते जा रहे है मगर अभी तक कुछ नज़र ही नही आ रहा हैं। कंफ्यूजन ही कंफ्यूजन हैं। कभी सोशल मीडिया से तो कभी सोसाइटी से मटेरियल बराबर आता रहता है। तेली राम इन्हीं बातों से दो चार हुए जा रहा था। स्थिति असमंजस बनी थी। घर में जबसे दो पैसे क्या आने लगे सुख- शांति जाने लगीं।पहले कम खर्चे में भी घर- गृहस्थी की गाड़ी खिंच जाती थी लेकिन अब महंगाई व टैक्स की मार से हलकान से हो गए हैं। इन सब बातों को सुनकर तैली राम अब पक चुका था। रसोईघर की गैस तो अब दस सैकड़ा महंगी हो चुकी थी,खाना तो पकता नही था हा ये जुगाड़ करते करते वो पक चुका था। कभी उसे लगता कि ये सब बेकार हैं। जब कुछ काम मिलने लगता तो समझता कि वह बोझ तले दब जाएगा।
वक़्त हाथ में रखी रेत की तरह फिसलती जा रही थी। आस-पास घटित होने वाली चीजों से तैली राम परेशान था। ये करो तो कुछ नही वो करो तो कुछ नही।आखिर करें तो करें क्या?। उहापोह की इस आंधी में उसे दूर तक भी कोई चिराग मय्यसर नही हो रहा था। अचानक कुछ देर के लिए वह चेतनाशून्य हो गया। बर्फ पड़ते ही थर्मामीटर के पारे की तरह लुढकते लुढकते वह भी शून्य में आ गया। फिर टहलते टहलते मोहल्ले के दाएं ओर गली में नीम के बड़े पेड़ के पास तक हो आया। दीवार से नीचे झाँका तो कुछ बच्चें अमिया की टहनी में सावन के फुहारों के बीच मस्त -मस्त झूल रहे हैं। कही बच्चे फूलों की क्यारियों से अलग – अलग रंगों के फूलों से कलश सजा रहें हैं। कुछ बच्चों के हाथ गीली मिट्टी से सने हुए हैं तो कुछ धमा – चौकड़ी मचाकर आने -जाने वालों का ध्यान अपनी ओर खींच रहे थें। ये सब देख तैली राम का शरीर जड़ और दिमाग घोड़े की तरह दौड़ने लगा। उत्सुकतावश और अधिक क्या हो रहा है देखने की चाह में तैली राम ने दीवार फाद दी।

मास्टर साहब का चेहरा टेबल पर रखे रजिस्टर व कॉपियों से ढका था। जब एक रजिस्टर पूरा होता तो दूसरे को उठाने के लिए मास्टर साहब का सिर्फ सिर ही दिखता। मुह दिखाई अभी भी बची थी। लगता था रजिस्टर व कॉपियों ने मास्टर जी के इर्द – गिर्द दीवार चिन दी हो और वो सिर्फ रोशनदान से बाहर झांकते नज़र आ रहे हों। इतने में सारे बच्चें बारी – बारी से अपने काम का हिसाब -किताब बताने लगे। गुड, वेरी गुड, फेयर, एक्सीलेंट, वेलडन इत्यादि शब्दों से मास्टर साहब बच्चों को इनाम सा बॉटने लगे। बच्चें कार्यक्रम की तैयारी पूरी कर अपने प्रिय गुरुजी को बुलाने आने लगे। गुरुजी काम मे इतने व्यस्त थे कि तकरीब 15 मिनट के बाद ही हू हंकार भरी। इसी क्षण तैली राम को मास्टर साहब के पूरे दर्शन एक साथ हो पाए। तैली राम कुछ देर के लिए ख़यालो में खो गया। उसे अपने बचपन के बिताए दिन याद आने लगे।

सम्मान आज मास्टर साहब के हाथों सम्मानित हो रहा था। छोटी -छोटी खुशी देख तैली राम सोच रहा था इन लोंगो को कोई दुख नही होगा, तभी ये इतने खुश और मस्त हैं। मास्टर साहब जैसे उसके मन को पढ़ रहे थे और कह रहे थे ऐसा तो हो ही नही सकता कि किसी को कोई दुख या तकलीफ ना हो लेकिन हमें जीवन में सदैव सकारात्मक देखना चाहिए । इससे ही हमें प्रतिदिन एक नई ऊर्जा मिलती है और हम कल से बेहतर आज के जीवन को जी सकते हैं। तैली राम अपना गम इन खुशियों में घोल चुका था। और अब हर साल शिक्षक दिवस का इंतज़ार करने लगता कि उसे इस साल और अधिक बेहतर ज़िंदगी जीने का सूत्र मिलेगा।

प्रेम प्रकाश उपाध्याय ‘ नेचुरल’ उत्तराखंड

(स्वतंत्र चिंतक,शिक्षक, क्रिएटिव राइटर)

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