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उत्तराखण्ड

विद्यालयी परीक्षा और प्रतियोगी परीक्षा की दूरी/फर्क कैसे कम हो : हरी मोहन ऐंठानी

आधुनिक समाज इंटरनेट के युग में जी रहा है, जहां प्रतियोगिता का स्तर काफी बढ़ गया है, लेकिन आधुनिक युवा युवतियां अपने स्तर से शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी कुछ ही युवा युवतियां हैं जो प्रतियोगी परीक्षा में सफल हो पा रहे हैं। भले ही किसी भी क्षेत्र में हो पहले की अपेक्षा युवतियां युवकों से ज्यादा कामयाबी हासिल कर रहीं हैं, जाहिर है वो युवकों की अपेक्षा अपने कैरियर के प्रति ज्यादा जागरूक हैं और मेहनती हैं। आज बच्चे महंगे महंगे शिक्षण संस्थानों में अध्ययन कर रहे हैं जहां एक मध्यम और निम्न वर्गीय परिवार अपने बच्चों को पढ़ाने का सपना भी नहीं देख सकता है जहां हर संभव सुविधाएं हैं लेकिन परिणाम स्वरूप इन संस्थानों के कुछ बच्चे ही प्रतियोगी परीक्षा में सफल हो पा रहे हैं , भले ही शिक्षा किसी भी संस्थान से ले रहे हूं लेकिन बिना कोचिंग संस्थानों के सहारे प्रतियोगी परीक्षा पास करना मुश्किल हो गया है, जब विषयों की पढ़ाई लगभग हर विद्यालय में हो रही है तो फिर अधिकतर क्यों बच्चे प्रतियोगी परीक्षा को पास करने में नाकामयाब हो रहे हैं। एक वजह यह है कि शिक्षा का दायरा अधिक से अधिक % अंक लाओ के दायरे में सीमित हो गया है , इसमें कोई शक नहीं कि जो बच्चा पढ़ने के प्रति अत्यधिक समर्पित होगा तो जरूर अच्छा कमयाबी हासिल करेगा , लेकिन जरूरी भी नहीं कि इस स्तर का हर बच्चा पूर्ण रूप से प्रतियोगी परीक्षा में कामयाब हो, बच्चे एक हिसाब से रटने की शिक्षा में जी रहे हैं जो क्वालिटेटिव न होकर क्वांटिटेटिव सा लगता है। बच्चे का बेसिक ज्ञान का स्तर गिरते जा रहा, जो कि बच्चे की शिक्षा की नीव है। ज्यादातर बच्चों का घर से दूर कोचिंग संस्थान में पढ़ना एक फैशन सा लग रहा है। बहुत कम बच्चे है, जो बिना कोचिंग के सहारे प्रतियोगिता पास कर पा रहे हैं। बच्चा व्यवहारिक , वास्तविक और तकनीकी कौशल से काफी दूर है, जिस कौशल की जरूरत प्रतियोगी परीक्षा में कामयाबी पाने के लिए बहुत जरूरी है ,दूसरी वजह है रीजनिंग से संबंधित विषय जो शिक्षा के किसी भी सत्र में नहीं पढ़ाया जाता, कुछ कुछ नवोदय , घोड़ाखाल और छात्रवृति परीक्षा में यह पूछा जाता है, जिसे बच्चे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर तक प्रतियोगी परीक्षा पास करने में पढ़ते हैं। मेहनती बच्चे और विषय तो पढ़ ही लेते हैं लेकिन रीजनिंग विषय में पीछे हो जाते हैं ,जिसका उनको बेसिक ज्ञान नहीं है। ऐसा लगता है नई शिक्षा नीति के तहत इस विषय को कैसे न कैसे कक्षा स्तर के अनुसार शामिल किया जाना चाहिए ताकि बच्चे को उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद प्रतियोगी परीक्षा में कुछ बेसिक ज्ञान मिल जाए। बच्चा स्वयं भी जागरूक हो और समर्पित हो अपने कैरियर के प्रति तभी कुछ हो सकता है। अभिभावकों को जबरदस्ती बच्चे पर कोई विषय न थोपा जाय, जागरूक बच्चा अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही अपना कैरियर चुनेगा। बच्चे को पढ़ना है अभिभावकों को नहीं। और एक अहम विषय नैतिक शिक्षा पर जोर दिया , वास्तविक ज्ञान की पहली कुंजी नैतिक शिक्षा है, साथ में शिक्षा के दौरान बीच बीच में कैरियर काउंसिल से भी रूबरू कराया जाय। शिक्षा विशेषज्ञ व बच्चों की विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं से सरोकार रखने वाले प्रेम प्रकाश उपाध्याय (नेचुरल) का भी यही कहना है कि विद्यालय शिक्षा के पाठ्यक्रम में रीजनिंग,न्यूमेरिकल एबिलिटी,एप्टीट्यूड,रियल लाइफ सिचुएशन बेस्ड प्रश्नों को भी जोड़ा जाए ताकि बच्चे कोचिंग संस्थान के बिना भी सीधे प्रतियोगी परीक्षा में कामयाबी पा सकें।

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