कुमाऊं में होता था पारम्परिक खतडुवा,अब विलुप्त की ओर

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अल्मोड़ा। वर्षा ऋतु के समाप्त होने तथा शरद ऋतु प्रारंभ होने पर यानि आश्विन महिने के प्रथम दिन को कुमॉऊ में मनाया जाने वाला खतडुवा (गाईत्यार) माना जाता है।
प्रताप सिंह नेगी समाजिक कार्यकर्ता ने बताया खतडुवा त्यौहार प्राचीन काल से ही पशु धन को लगने वाली बिमारियों की रोक व पूस माघ के डंठ से बचने के लिए टुटका वाला त्यौहार भी है।
खतडुवा त्यौहार की एक अलग ही पहचान है। गांवों में आज के दिन अपनी अपनी बिरादरी के लोग अपने घर से थोड़ा-बहुत दूर जाकर खतडुवा देवता का मंदिर बनाते हैं, उस मंदिर के बाहर छोटे छोटे पत्थरों को रख कर अपने अपने घरेलू पशुओं का नाम रखते हैं।
मंदिर के सामने ही दो खंबे गाड़ते है उन खंबो में पिरियूल घास भूसा डालकर ऊंचा जैसा बना देते‌है। घर के बड़े बुजुर्ग इस खतडुवा देवता की पूजा के लिए चीड के छिलके बेटूली के टैहनी,पारी पौधे की टहनी व दो तीन फुट की लंबी से बांध कर ककड़ी,अमरुद केला, पंच मेवा, पंच पंच मिठाई व चीढ के छिलके के साथ बेटूली की टहनी,पारी पौधे की टहनी व दो तीन फुट से घास से लपेटा हुआ मसाल के साथ अपने अपने गांव से झुड बनाकर निकलते हैं। शाम को छह बजे से सात बजे के बीच में भैलो खतडुवा मैले खतडुवा व कसेर मसेर भाग जा हमारे जानवरों की रक्षा कर जा करके नारे बाजी मसाल लेकर उस मंदिर में जाते हैं जहां खतडुवा का मंदिर बनाया होता है।
मसाल को खतडुवा के मंदिर के पास रखकर खतडुवा देवता की पूजा बिधि बिधान से होती है, उसके बाद खतडुवा देवता मंदिर के पास जो पुतला बनाया होता है उसमें पांच बार प्ररिकमा करके आग लगाया जाता है।

आग लगाने के बाद फिर वापस अपने अपने गांवों में जाकर जहां पालतू पशु रहते हैं उनको मसाल की आग उनको चरणों स्पर्श की जाती है उसके बाद अपने घर के चार दीवारी घर के अंदर सभी को उस मसाल की आग सेकनी होती ताकि सब ठंड से बच सके और हमारे पालतू पशु बच सके। तब खतडुवा गै की जीत और खतडुवे की हार भाग भाग खतुडवे।तब गाय की जीत होती है।

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नेगी ने बताया आज से 30साल पहले खतडुवा पारंपरिक त्यौहार बड़ी धूमधाम से मानाया जाता था, लेकिन जैसे जैसे उत्तराखंड के युवाओं का पलायन हुआ ऐसे ही खतडुवा पारंपरिकता से लुप्त की ओर चला गया।

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