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टिहरी के इतिहासकार और चिंतक डॉ. गिरिधर पंडित का निधन, विरासत में मिली थी वैचारिक दृढ़ता

उत्तराखंड के जाने-माने इतिहासकार, शिक्षाविद् और वरिष्ठ वामपंथी चिंतक डॉ. गिरिधर पंडित का शनिवार दोपहर करीब साढ़े बारह बजे लंबी बीमारी के बाद देहांत हो गया। वे 82 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से कैंसर से पीड़ित चल रहे थे। उनके निधन से राज्य के बौद्धिक, राजनीतिक और सामाजिक हलकों में गहरा शोक छा गया है। 9 अप्रैल 1944 को देवप्रयाग (टिहरी गढ़वाल) के एक प्रतिष्ठित पंडा परिवार में जन्मे डॉ. पंडित को देशभक्ति और वैचारिक दृढ़ता विरासत में मिली थी। उनके पिता स्व. मुरलीधर शास्त्री संस्कृत के प्रकांड विद्वान, बहुभाषाविद् और बद्रीनाथ के पुरोहित थे, जो आचार्य नरेंद्रदेव के समाजवादी विचारों से प्रभावित थे। उनके चाचा स्व. प्रेमलाल वैद्य प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, टिहरी राज्य प्रजामंडल के प्रधानमंत्री, जिला परिषद अध्यक्ष और विधायक रहे।
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टिहरी की राजशाही के खिलाफ शोध और वामपंथ से जुड़ाव
डॉ. पंडित टिहरी की निरंकुश राजशाही के विरुद्ध हुए जन-विद्रोह पर शोध करने वाले संभवतः पहले भारतीय शोधकर्ता थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा देवप्रयाग में हुई, जिसके बाद उन्होंने देहरादून के डी.ए.वी. और गुरु रामराय कॉलेज से विज्ञान में स्नातक की डिग्री ली। इसके बाद कुछ वर्षों तक उन्होंने गुजरात के अहमदाबाद में अध्यापन कार्य किया और कुमाऊं विश्वविद्यालय के अल्मोड़ा कैंपस से राजनीति विज्ञान में एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2023 में प्रकाशित उनका शोध प्रबंध ‘टिहरी की जनक्रांति’ इतिहास प्रेमियों के बीच एक मील का पत्थर साबित हुआ। 1963 से साम्यवादी विचारों से जुड़ने वाले डॉ. पंडित 1969 में भाकपा के सदस्य बने और पार्टी के सबसे युवा महासचिव पी.सी. जोशी के करीबी सहयोगियों में गिने जाते थे। वे भाकपा के सह राज्य सचिव और राज्य कंट्रोल कमीशन के चेयरमैन जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों पर भी रहे।
संघर्षों से भरा जीवन और शिक्षा जगत में अमूल्य योगदान
शिक्षा और समाज सुधार के क्षेत्र में उनका योगदान अविस्मरणीय है। वर्ष 1984 में जब देवप्रयाग महाविद्यालय की शुरुआत हुई, तब प्रबंध समिति के पास मात्र 84 रुपये थे। डॉ. पंडित ने 6 महीने तक जनसहयोग और चंदे के बल पर कॉलेज का संचालन किया और बाद में इसे ॐकारानन्द एजुकेशन सोसाइटी को सौंपते हुए 10 वर्षों तक इसके प्राचार्य के रूप में सेवाएं दीं। उनका संपूर्ण जीवन संघर्ष की मिसाल रहा। अल्मोड़ा में हुए ‘वन बचाओ आंदोलन’ के दौरान उन्हें 99 दिन भूमिगत रहना पड़ा था और जेल यात्राएं भी करनी पड़ीं। उन पर दिनदहाड़े डकैती जैसी संगीन धाराओं में ढाई साल तक मुकदमा चला, जिससे वे अंततःसम्मानपूर्वक बरी हुए। उनके शोध निर्देशक डॉ. जाकिर हुसैन अक्सर कहते थे कि उनका एक पैर सड़क पर और दूसरा जेल में रहता है। इसके अलावा, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में भी उन्होंने देवप्रयाग में सक्रिय भूमिका निभाई।
अंतिम समय तक मुखर रहे
बुढ़ापे और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के बावजूद वे सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय थे और वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिवेश तथा सांप्रदायिकता के खिलाफ लगातार मुखर होकर लिखते थे। कविताएं लिखने और सोशल मीडिया पर उनका वाचन करने के शौकीन डॉ. पंडित का अपना एक कविता संग्रह प्रकाशित करवाने का सपना अधूरा ही रह गया। उनके निधन को वामपंथी आंदोलन, शिक्षा जगत और उत्तराखंड के इतिहास लेखन के लिए एक अपूरणीय क्षति माना जा रहा है





