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उत्तराखण्ड

कुमाऊंनी कहावत- चालाक होते हैं द्वाराहाट के बैल भी…

कुमाऊं में अलग-अलग जगहों पर अनेक लोककथाएं,कहावत प्रचलित हैं। इन्हीं कुमाऊंनी लोककथाओं में आज हम आपको द्वाराहाट के बैल भी चालाक होते हैं पर आधारित लोककथा पढ़ाने जा रहे हैं। अल्मोड़ा जिले मे जिला मुख्यालय की तरफ रहने वालों को अल्मोड़िया और द्वाराहाट की तरफ रहने वालों को दोरयाव या दोरयाल कहते हैं। अब अल्मोड़ीयों को लगता है कि दोरयाव तेज होते और द्वाराहाट वालों को लगता कि अल्मोड़िये तेज होते हैं। इसी बात पर एक कुमाऊनी कहावत भी है कि,” द्वारहाटक बल्द ले तेज हुनी ” अर्थात द्वाराहाट के बैल भी तेज होते हैं । कहते है एक बार स्याल्दे बिखोती के मेले मे एक अल्मोड़ा वाला अपने बैल के साथ मेला देखने पहुंचा उसका बैल सुन्दर, तेज हट्टा –कट्टा था। शायद वो अपने बैल से प्रतियोगिता लड़ाने के भाव से वहां लेकर गया था।

वहां उसे एक द्वाराहाट वाला भी अपने बैल के साथ मिल गया । अल्मोड़ा वाले और द्वाराहाट वाले के बीच शर्त लग गई कि किसका बैल तेज है। दोनों मे तय हुवा कि दोनो बैलों को गधेरे मे ले जाते हैं, जिसका बैल देर तक पानी पियेगा वो विजयी होगा। दोनो बैलों को गधेरे में ले जाया गया। वहां दोनों पानी पीने लगे। अल्मोड़ा वाले का बैल फटाफट पानी पीने लगा, लेकिन द्वाराहाट वाले का बैल पानी के अन्दर मुंह डालकर खाली पानी पीने का नाटक करता रहा।अल्मोड़ा वाले के बैल ने खूब सारा पानी पी लिया इसलिए वह जल्दी वहां से हट गया और द्वाराहाट वाले का बैल देर तक पानी में मुंह डाल कर पानी पीने का नाटक करता रहा और विजयी हुआ । इसलिए कहते हैं, द्वाराहाट का बैल भी चतुर होता है।
ऐसी ही मिलती जुलती कुमाऊंनी कहावत पिथौरागढ़ क्षेत्र में भी कही जाती है। वहां सोर घाटी वालों को लगता है कि गंगोली वाले तेज होते हैं। और गंगोली वालो को लगता है कि सोर घाटी के लोग तेज होते हैं। वहां के हिसाब से कहते हैं कि गंगोली वालो का बैल भी तेज होता है। और इसी लोक कथा के अनुसार सोर के बैल और गंगोली के बैल के बीच ठन जाती है कि कौन ज्यादा पानी पियेगा ? शर्त पूरी करने दोनों बैल रामगंगा में जाते हैं। वहां सोर का बैल बहुत सारा पानी पी लेता है जिससे वो मर जाता है। और गंगोली का बैल खाली पानी मे मुंह डाले रहता है। वो जीत जाता है ,और बच भी जाता है। एक दूसरे को तेज कहने की यह कहानी द्वाराहाट- अल्मोड़ा, सोरघाटी -गंगोली के बीच नहीं है ,बल्कि पूरे पहाड़ में है। उत्तरकाशी गंगा में घाटी और यमुना घाटी वालों के बीच और टिहरी और पौड़ी वालों के बीच भी यही कहानी है। सबसे बड़ी बात गढ़वाल और कुमाऊं के बीच भी यही कहानी है। पहाड़ों के जनजीवन मे एक क्षेत्र या पट्टी के निवासी हमेशा दूसरे क्षेत्र के निवासियों को यह कहकर कोसते या चिढ़ाते हैं, कि उस जगह के निवासी चतुर- चालाक होते है। या उस जगह के निवासी तेज होते हैं। असल में तेज कोई नहीं होता, क्योंकि सबको पता है। पहाड़ी सबसे सीधे होते हैं। हंसी मजाक तक ये बात अच्छी लगती है लेकिन कई बार कोई नेता प्रवृत्ती का व्यक्तित कई धूर्त लोग इसी बात को लेकर क्षेत्रों के मध्य वैमनस्यता उत्पन्न करवाने का भी प्रयास करते हैं।

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