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उत्तराखण्ड

हिंदी व भाषायी अखबार ही हैं असली भारत की पहचान- प्रो. के.जी. सुरेश

भाषा के बिना पत्रकारिता अधूरी है आज भाषा का क्षरण हो गया है मीडिया शिक्षार्थियों का साहित्य से नाता टूट गया है। भारतीय भाषाओं के अखबारों में अपनी माटी की खुशबू है जिसका जिंदा रहना जरूरी है ये कहना है प्रोफेसर के.जी सुरेश का जो कि एशिया के पहले व देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थान माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति हैं. अवसर था उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं पत्रकारिता विभाग द्वारा हिंदी पत्रकारिता दिवस पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का। सेमिनार में बतौर मुख्य अतिथि उन्होंने कहा कि आजादी के वक्त राष्ट्रीयता हमारी पत्रकारिता का अभिन्न अंग थी आज भी एक पत्रकार को एक मीडिया पेशेवर को अपने राष्ट्र को केन्द्र में रखकर पत्रकारिता करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि हिंदी का पहला अखबार उदंत मार्तंड बेशक 9 माह में बंद हो गया लेकिन उसका प्रभाव बहुत गहरा पड़ा। उन्होंने मीडिया के शिक्षार्थियों के अलावा भी देश के हर व्यक्ति के लिए मीडिया साक्षरता को जरूरी माना।

इस मौके पर सेमिनार के उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता भारतीय जन संचार संस्थान नई दिल्ली में प्रोफेसर डा. प्रमोद कुमार ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के 200 सालों में हमें आत्मअवलोकन करने की जरूरत है कि समाज के सभी तबकों को मुख्यधारा में क्या हम ला पाए हैं। उन्होंने मीडिया संस्थानों को पाठक सर्वे करने की सलाह देते हुए कहा कि सकारात्मक खबरों को अखबारों को प्रमुखता से प्रकाशित करना चाहिए ताकि लोगों में निराशा की जगह उत्साह का संचार हो। सेमिनार में उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ओ.पी.एस नेगी ने कहा कि पत्रकारिता ही समाज को दिशा देती है लोगों को सूचना सम्पन्न बनाती है इसीलिए एक पत्रकार का संवेदनशील होना, दूरदृष्टिवान होना राष्ट्र के लिए सोचना बहुत जरूरी है। सेमिनार के सहप्रायोजक एमबीपीजी कालेज हल्द्वानी के प्रिंसिपल प्रो. बनकोटी ने भी पत्रकारिता में जनसरोकारों की जरूरत को जरूरी बताया। यह सेमिनार मीडिया स्टडीड एंड रिसर्च एसोसिएशन, एमबीपीजी कालेज हल्द्वानी व उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के सहयोग से आयोजित की गई थी। सेमिनार का मुख्य विषय था विकसित भारत 2047 का संकल्प और न्यू मीडिया ; हिंदी पत्रकारिता के विशेष संदर्भ में.

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सेमिनार के आयोजक विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं मीडिया अध्ययन विद्याशाखा के विभागाध्यक्ष डा. राकेश रयाल ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के इन 198 सालों में भाषाई तौर पर पत्रकारिता में काफी गिरावट आई है। मीडिया शिक्षार्थियों की नई पीढ़ी न तो हिंदी की देवनागरी लिपी पंसद करती है और न ही रिपोर्टिंग वाली पत्रकारिता को। सभी को एंकर बनना है या फिर कारपोरेट में इवेंट मैनेजर. ऐसे में चुनौती बड़ी है कि कैसे पत्रकारिता की नयी पीढी के सामने हिंदी पत्रकारिता के आर्दशों को रखा जाए। मानविकी विद्याशाखा की निदेशक प्रो. रेनू प्रकाश ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने के लिए उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा नये रचनात्मक प्रयोग किये जाएंगे। इस मौके पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. पी.डी, पंत ने सभी अतिथियों का आभार जताया। सेमिनार का संचालन हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डा. शशांक शुक्ला ने किया।

सेमिनार के द्वितीय सत्र में बतौर मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन रौतेला ने हिंदी पत्रकारिता के लिए उत्तराखंड के पत्र पत्रिकाओं पर बहुत विस्तार से बात रखी। टिहरी राजशाही का आंदोलन हो या स्वतंत्रता संग्राम या फिर उत्तराखंड आंदोलन हिंदी अखबारों ने ही लोगों में चेतना का प्रचार प्रसार किया। इस मौके पर उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार डॉ. गणेश पाठक ने बतौर अध्यक्षीय उद्बोधन में अपने 30 साल के पत्रकारिता के अनुभवों को साझा किया। इस मौके पर दर्जन भर शोधार्थियों ने विभिन्न विषयों पर शोध पत्र पढ़े जिनमें उत्तराखंड मुक्त विवि के शोधार्थी गणेश जोशी ने हिंदी पत्रकारिता में हिंदी भाषा पर अपना पत्र प्रस्तुत किया। आशा जोशी ने हिंदी पत्रकारिता और तकनीकि पर पत्र पढ़ा। दीपिका नेगी ने सोशल मीडिया में फेक न्यूज पर पेपर प्रस्तुत किया। सेमिनार में एमबीपीजी कालेज ह्ल्दवानी, राजकीय महाविद्यालय कोटाबाग व उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने शोध पत्र प़ढ़े। इस मौके पर संगोष्ठी के सह सयोंजक राजेंद्र क्वीरा, अल्मोड़ा में हिंदी विभाग में डा. ममता पंत, डा. कल्पना लखेड़ा, डा. अखिलेश सिंह, डा. मनोज पांडे, डा. डिगर सिंह फरर्सवाण, मीडिया स्टडीज एंड रिसर्च एसोसिएशन के विपिन चन्द्रा, भूपेन्द्र सिंह, सुमित सिंह, अनिल नैलवाल, हरीश गोयल, विभु कांडपाल समेत कई लोग उपस्थित रहे।

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