उत्तराखंड: “पहाड़ में जीवन या पहाड़ सा जनजीवन,,

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उत्तराखंड राज्य बनने से उत्तराखण्ड वासियों को क्या मिला?विकास तो कहीं नजर नही आता उलटा अधिकांश खेती बंजर हो गई। मुफ्तखोरी ने लोगों को नकारा बना दिया। विकास हुआ है तो सिर्फ नेताओं और अफसरों का। ताज्जुब तो तब होता है जब व्यवस्था के खिलाफ बात करने लगो तो लोग उन्ही का साथ देते हैं।

एक महीने पूर्व मैं कुमाऊँ गया था,कुछ इलाकों में घूम आया। यह कटुसत्य है कि पहाड़ दूर से सुहावने लगते हैं,यहां जाकर देखें तो यहां का जीवन बहुत विकट है। मुझे अधिकांश गाँव ऐसे मिले जहां के खेत बंजर हो गए। कारण जानना चाहा तो सभी जगह से एक ही उत्तर मिला जंगली जानवर नही होने देते खेती, इसलिए पैसा और श्रम क्यों बर्बाद करें?मैंने स्वयं मेरी आँखों से देखा मेरे नैनिहाल में एक खेत मे आलू लगाए गए थे,जिस समय मैं वहां पहुंचा पूरा परिवार लंगूरों को खदेड़ने गया था, उनके खेत में लगाए आलू के सभी पौंधे लंगूरों ने उखाड़ दिए। ये पौंधे मात्र 6-7इंच के थे। उन लंगूरों ने पूरा खेत ही उजाड़ कर रख दिया। इतना ही नही रात होते ही सब घर में कैद हो जाते हैं बाघ के डर से। रात को पास ही बाघ के दहाड़ने की आवाज सुनाई दे रही थी। अब तो ग्रामीण पशुओं, कुत्तों को भी पालने से डरने लगे हैं, न जाने कब बाघ का निवाला बन जाएं। ऐसे में पलायन नही होगा तो क्या होगा?अपनी जान गंवाने कौन इन पहाड़ों में रहेगा? आए दिन खबरे मिलती हैं कि गाँव में बाघ,तेंदुए, गुलदार ने हमला कर दिया। आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 485 लोग इन हिंसक पशुओं की वजह से जान गवां चुके और 1700 लोग घायल हुए।

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शासन-प्रशासन को सिर्फ विकास के आंकड़े चाहिए धरातल में कोई काम/सुविधा पहाड़ में नही है। गावों में पहले जो कुटीर उद्योग थे वे भी नजर नही आए। रहीसही कसर पहाड़ में नशे ने पूरी कर दी, बढ़ती नशाखोरी ने युवाओं को खोखला कर दिया,यहां के किसी भी बाजार में किसी भी दुकान/रेस्तरां में चले जाएं दो-चार लोग पीते हुए मिल जाएंगे ताज्जुब तो तब होता है जब इन्ही दुकान के बाहर पुलिस गश्त करती मिलती है,इन पीने वालों को पुलिस की कोई परवाह है ही नही।यहां यातायात की सुविधा भी भगवान भरोसे ही चल रही है। पहाड़ के इन सर्पीली सड़कों में बहुत ही घटिया बसें हैं।

इनकी सीटों में सही ढंग से बैठ भी नही सकते। रही सही कसर तब और निकल जाती है जब यात्री उल्टी करते हुए सफर पूरा करते हैं गंतव्य तक पहुंचने तक घायल हो जाते हैं। यहां टैक्सियों का जमावड़ा सभी जगह भारी मात्रा में दिखाई देता है,इनके लिए कोई नियम नही,मर्जी का किराया और ठूंस कर भरी सवारीयां, समय का कोई मोल नही,यात्रा सबसे बड़ी दुस्वारी हो जाती है। सच में “पहाड़ में जीवन है या पहाड़ सा जनजीवन है।”

-आरएस थापा

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