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क्या है क्वाड्रिप्लेजिया जिसने ली Harish Rana की जान?, 13 साल से थे कोमा में

सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने वाले हरीश राणा ने मंगलवार, 24 मार्च को एम्स में अंतिम सांस ली। बीते 13 सालों से वो कोमा में थे। एक ही स्थिति में रहकर वो जिंदा तो थे, लेकिन सिर्फ नाम के लिए। आसपास की दुनिया से वो पूरी तरह कट चुके थे। मां-बाप की गुहार के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को यूथेनेशिया यानी इच्छा मृत्यु की अनुमति दी थी।

दरअसल गाजियाबाद के रहने वाले 32 साल के हरीश राणा का मामला बीदे कुछ दिनों से पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मिलने के बाद उन्हें एम्स दिल्ली में शिफ्ट किया गया था।

जहां धीरे-धीरे उनकी लाइव सपोर्ट हटाने की प्रक्रिया की गई और उन्हें इच्छा मृत्यु दी गई। हरीश राणा को क्वाड्रिप्लेजिया मेडिकल कंडीशन थी। जिसने सभी का ध्यान खींचा। आपको बता दें कि क्वाड्रिप्लेजिया एक ऐसी स्थिति है जो जिस इंसान को भी होती है उसकी जिंदगी पूरी तरह से बदल देती है।

क्वाड्रिप्लेजिया एक गंभीर कंडीशन है। इसमें व्यक्ति के दोनों हाथ और दोनों पैर काम करना बंद कर देते हैं। आमतौर पर ये कंडीशन इंसान को तब होती है जब किसी के गर्दन के हिस्से में स्पाइनल कॉर्ड में गंभीर चोट आई हो। स्पाइनल कॉर्ड शरीर का मेन हिस्सा होता है। यहां से दिमाग से आने वाले सिग्नल हाथ और पैर तक पहुंचते है।

ऐसे में अगर गर्दन के पास का हिस्सा डैमेज होता है तो शरीर के चारों अंगों की मूवमेंट पूरी तरह से खत्म हो जाती है। इसी कंडीशन को सर्वाइकल स्पाइन कॉर्ड इंजरी कहते है। आगे चलकर यहीं क्वाड्रिप्लेजिया का रूप लेती है।

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हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे हरीश राणा
जानकारी के लिए बता दें कि हरीश राणा पंजाब यूनिवर्सिटी में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। ये बात साल 2013 की है। इसी दौरान वो अपनी हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए। जिसकी वजह से उनकी गर्दन और सिर पर काफी गंभीर चोटे आई।

चोट इतनी गंभीर थी, इस बात का अंदाजा आप इससे लगा सकते है कि वो इसके बाद कभी उठे ही नहीं। वो परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट में चले गए।

सालों के इलाज के बाद भी कोई सुधार नहीं
13 सालों से वो बिस्तर पर ही थे। ना वो चल सकते थे, ना बोल सकते थे और ना ही उनका अपने शरीर पर कंट्रोल था। मशीनों के सहारे वो सांस और खाना-पानी पी रहे थे। सालों तक मां-बाप उनका इलाज करवाते रहे इस उम्मीद में कि वो एक दिन उनसे बात करेगा। हालांकि सालों के इलाज के बाद भी उनकी हालत में कोई सुधार नहीं था। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए हरीश राणा को पैसिव युथेनेशिया की अनुमति दी थी।

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