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हल्द्वानी बनभूलपुरा रेलवे अतिक्रमण मामले में 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का फैसला सम्भव

मीनाक्षी

हल्द्वानी के बनभूलपुरा रेलवे भूमि अतिक्रमण मामले में 9 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने की संभावना है। चीफ जस्टिस की बेंच में मामले को बुधवार की सुनवाई सूची में तीसरे नंबर पर रखा गया है। पिछले करीब दो महीने से सुनवाई की तारीख लग रही थी, लेकिन केस की क्रम संख्या 15 से ऊपर होने के कारण सुनवाई नहीं हो पा रही थी।

रेलवे और उत्तराखंड सरकार की ओर से मामले की जल्द सुनवाई का अनुरोध किए जाने के बाद अब 9 सितंबर को सुनवाई और फैसले की उम्मीद जताई जा रही है। मामले को लेकर केंद्र और धामी सरकार ने कानूनी तैयारियां तेज कर दी हैं।

सुरक्षा को लेकर अलर्ट

मामले में बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित हैं। ऐसे में गृह विभाग ने जिला प्रशासन और पुलिस को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दिन सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखने के निर्देश दिए हैं। प्रशासन संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती समेत अन्य सुरक्षा इंतजाम कर सकता है।

बनभूलपुरा में रेलवे की जमीन से अतिक्रमण हटाने का मामला लंबे समय से अदालत में चल रहा है। दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल ध्वस्तीकरण की कार्रवाई पर रोक लगा दी थी।
इसके बाद 24 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रभावित लोगों को हटाने से पहले पुनर्वास योजना पर विचार किया जाए। कोर्ट ने रेलवे, केंद्र और उत्तराखंड सरकार समेत संबंधित विभागों को बैठक कर पुनर्वास की रूपरेखा तैयार करने के निर्देश दिए थे।

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रेलवे का तर्क- जमीन हमारी, पुनर्वास की नीति नहीं

रेलवे का कहना है कि विवादित जमीन रेलवे की है और उस पर कब्जा अवैध है। रेलवे ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी कहा है कि उसके पास अतिक्रमणकारियों के पुनर्वास या मुआवजे की कोई नीति नहीं है।

वहीं, प्रभावित लोगों की ओर से लंबे समय से वहां रहने, नगर निकाय के रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने और हाउस टैक्स समेत अन्य सुविधाएं मिलने को अपने पक्ष में आधार बनाया गया है।

2007 से चल रहा विवाद

याचिकाकर्ता रविशंकर जोशी के मुताबिक, रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने का मामला 2007 से अदालतों में चल रहा है। 2016 में हाईकोर्ट ने रेलवे को अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। 2017 में भी कोर्ट ने रेलवे को कार्रवाई के निर्देश दिए, लेकिन अतिक्रमण नहीं हट सका।इसके बाद 2022 में फिर जनहित याचिका दायर हुई। दिसंबर 2022 में हाईकोर्ट ने अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।

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