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उत्तराखंड में रक्षाबंधन पर खेली जाती है खून की होली, पत्थरों से होता है महायुद्ध

मीनाक्षी
उत्तराखंड में एक जगह ऐसी है जहां रक्षाबंधन एक दूसरे को पत्थर मारकर मनाया जाता है। जी हां, जिस दिन पूरे देश में बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध रही होती हैं। उसी दिन उत्तराखंड में एक ऐसी जगह है जहां खून की होली खेली जाती है। अब ये प्रथा क्यों निभाई जाती है और क्या है इस पत्थरों के महायुद्ध का राज क्या है, चलिए इस आर्टिकल में जानते है।
रक्षाबंधन के दिन ये मंदिर बन जाता है युद्ध का मैदान
आज हम आपको रक्षाबंधन से जुड़ी एक ऐसी कहानी बताने जा रहे हैं जिसे सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी। उत्तराखंड के चंपावत जिले के देवीधुरा में स्थित है मां वाराही का ये चमत्कारिक धाम। ये मंदिर वैसे तो साल भर शांत रहता है। लेकिन जैसे ही रक्षाबंधन का दिन आता है। इस मंदिर का प्रांगण एक युद्ध के मैदान में बदल जाता है।
एक दूसरे पर पत्थरों से करते है हमला
कुमाउं में इसे अषाढ़ी कौतिक या बगवाल युद्ध भी कहते हैं। रक्षाबंधन के दिन भाई की कलाई पर राखी बंधने के ठिक बाद चार गांवों के लोग आमने सामने आते हैं और एक दूसरे पर पत्थरों से हमला करना शुरु कर देते हैं। तब तक जब तक जमीन पर एक इंसान के शरीर के बराबर खून ना बह जाए। लेकिन ये लोग ऐसा किसी पुरानी दुश्मनी के चलते नहीं करते हैं।
बचाने के लिए एक लकड़ी की पारंपरिक ढाल
इन लोगों के हाथों में खुद को बचाने के लिए एक लकड़ी की पारंपरिक ढाल होती है जिसे फर्रा कहा जाता है। फिर देविधुरा के इस मैदान में सबसे पहले मां वाराही के जयकारे लगते हैं। ये चारों खामों के लोग मंदिर की परिक्रमा करते हैं। जिसके बाद सबकी नजरें टिकती हैं मंदिर के पुजारी पर। फिर जैसे ही पुजारी का इशारा होता है, पत्थरों की बारिश शुरू हो जाती है।
न कोई चीखता, न दर्द से कराहता
दोनों तरफ से एक-दूसरे पर पत्थर फेंके जाते हैं। कुछ ही देर में मैदान में खून की बूंदें टपकने लगती हैं। ये सभी लहूलुहान हो जाते हैं। सिर फट जाते हैं। लेकिन कोई पीछे नहीं हटता, न कोई चीखता है, न दर्द से कराहता है।
अब आप सोच रहे होंगे की जब कोई जमीन का विवाद नहीं है, कोई पुरानी दुश्मनी नहीं है। कोई हार-जीत का दांव नहीं है। तो फिर ये लोग एक-दूसरे की जान के दुश्मन क्यों बन जाते हैं। अब इस सवाल का जवाब छुपा है सदियों पुरानी एक कहानी में।
इस परंपरा से जुड़ी है कहानी
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, सदियों पहले मां वाराही को खुश करने के लिए इसी मंदिर में हर साल इन चारों खामों के लोग बारी बारी से अपने परिवार के एक इंसान की नर बलि दिया करते थे। कहा जाता है कि एक साल चम्याल खाम के एक परिवार की बारी आई। उस परिवार में सिर्फ एक बूढ़ी दादी और उसका इकलौता पोता था। अगर पोते की बलि चढ़ जाती, तो उस दादी का पूरा वंश खत्म हो जाता। उस रात वो बूढ़ी औरत मां वाराही की मूर्ति के सामने फूट-फूटकर रोई। उसने अपने पोते की जिंदगी की भीख मांगी।
पत्थर का युद्ध खेला जाएगा
किंवदंती है कि उस बूढ़ी औरत की उस दर्दनाक पुकार ने चमत्कार कर दिया। मान्यता है कि रात में मां वाराही ने उस वृद्धा को सपने में दर्शन दिए। देवी ने कहा कि आज के बाद किसी इंसान की बलि नहीं दी जाएगी। लेकिन एक शर्त थी। शर्त ये कि चारों खाम के लोग आपस में बग्वाल यानी पत्थर युद्ध खेलेंगे। ये युद्ध तब तक चलेगा, जब तक एक इंसान के शरीर के बराबर खून ना बह जाए।
तभी से ये एक परंपरा बन गई
कहते हैं कि तभी से ये एक परंपरा बन गई और इसी मान्यता के चलते आज भी ये बग्वाल खेली जाती है। जैसे ही मैदान में पत्थरों की मार से इतना खून बह जाता है जो एक इंसान के शरीर के बराबर हो, तो पुजारी शंखनाद करते हुए बग्वाल रोक देते हैं।
बग्वाल में पत्थरों की मार से कोई मरा नहीं
जो लोग अभी एक-दूसरे का खून बहा रहे थे। वो दौड़कर एक-दूसरे के गले लग जाते हैं। एक-दूसरे का हालचाल पूछते हैं। इस युद्ध का सबसे बड़ा रहस्य ये है कि आज तक इस बग्वाल में पत्थरों की मार से कोई मरा नहीं। किसी को कोई गंभीर या जानलेवा चोट नहीं आई। लोग इसे मां वाराही का चमत्कार ही मानते हैं।
साल 2013 में पत्थर के इस्तेमाल पर रोक
हालांकि साल 2013 में नैनीताल हाई कोर्ट में एक अदालत ने इस खतरनाक परंपरा पर सख्त रुख अपनाया और बग्वाल में पत्थरों के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी। जिसके बाद अब पत्थरों की जगह सेब, नाशपाती और फूलों से बग्वाल खेली जाती है।






